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भारत में आपसी सहमति से तलाक कैसे होता है?
छोटा जवाब
दोनों पति-पत्नी मिलकर फ़ैमिली कोर्ट में याचिका दायर करते हैं, 6 महीने इंतज़ार करते हैं (कूलिंग-ऑफ़ अवधि, जिसे माफ़ किया जा सकता है), फिर दूसरे मोशन के लिए पेश होते हैं। पूरी प्रक्रिया में 6-18 महीने लगते हैं।
मामले को समझें
आपसी सहमति से तलाक भारत में तलाक का सबसे आसान और तेज़ तरीका है। हिंदू विवाह अधिनियम धारा 13B (हिंदुओं के लिए) या विशेष विवाह अधिनियम धारा 28 (अन्य लोगों के लिए) के तहत, दोनों पति-पत्नी फ़ैमिली कोर्ट में संयुक्त याचिका दायर करते हैं। शर्तें: दोनों कम से कम 1 साल से अलग रह रहे हों, दोनों मानते हों कि शादी पूरी तरह टूट चुकी है, और दोनों शर्तों (गुज़ारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी, संपत्ति का बंटवारा) पर सहमत हों। प्रक्रिया में दो मोशन होते हैं: पहला मोशन — तय शर्तों के साथ संयुक्त याचिका दायर करें। दायर करने के बाद 6 महीने की अनिवार्य कूलिंग-ऑफ़ अवधि होती है (सुप्रीम कोर्ट ने अमरदीप सिंह केस में कहा कि सुलह की कोई संभावना न हो तो इसे माफ़ किया जा सकता है)। दूसरा मोशन — दोनों पति-पत्नी फिर पेश होकर पुष्टि करते हैं कि वे अब भी तलाक चाहते हैं। इसके बाद अदालत तलाक की डिक्री देती है। पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर 6-18 महीने लगते हैं। भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी और संपत्ति के बंटवारे पर पहले से लिखित समझौता होने से प्रक्रिया काफ़ी तेज़ हो जाती है। आपसी तलाक में दोनों पक्ष एक ही वकील रख सकते हैं, जिससे खर्च बचता है।
लागू कानून
- हिंदू विवाह अधिनियम — धारा 13B (आपसी सहमति से तलाक)
- विशेष विवाह अधिनियम — धारा 28 (आपसी सहमति से तलाक)
- फ़ैमिली कोर्ट अधिनियम — धारा 7 (क्षेत्राधिकार)
- अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) — कूलिंग-ऑफ़ अवधि माफ़ की जा सकती है