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व्यापार में पैसा वसूली

कोई क्लाइंट, ग्राहक, या व्यापारिक साझेदार आपका पैसा देने से मना कर रहा है।

अभी यह करें
  1. 01वकील के ज़रिए 15 दिन की समय-सीमा के साथ औपचारिक मांग नोटिस भेजें
  2. 02सभी इनवॉइस, परचेज़ ऑर्डर और भुगतान के रिकॉर्ड इकट्ठा करें
  3. 03डिलीवरी के सबूत के लिए नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट और ईमेल, दोनों से भेजें
  4. 04अगर चेक दिया गया था और बाउंस हो गया, तो 30 दिनों के भीतर धारा 138 का नोटिस भेजें
  5. 05अदालत में केस दायर करने से पहले मध्यस्थता या बातचीत पर विचार करें
  6. 06जल्दी वसूली के लिए CPC के ऑर्डर 37 के तहत संक्षिप्त मुकदमा दायर करें
  7. 07अगर संपत्ति बेचे जाने का खतरा है, तो कर्ज़दार की संपत्ति की कुर्की के लिए आवेदन करें
कौन से सबूत इकट्ठा करें
  1. सभी इनवॉइस और परचेज़ ऑर्डर
  2. भुगतान का इतिहास और बकाया रकम
  3. लिखित कॉन्ट्रैक्ट या एग्रीमेंट
  4. कर्ज़ स्वीकार करने वाली बातचीत (ईमेल, मैसेज, पत्र)
  5. बाउंस हुआ चेक और बैंक का रिटर्न मेमो (अगर लागू हो)
  6. डिलीवरी रसीदें या दी गई सेवा का सबूत
  7. खाता-बही की एंट्री और हिसाब-किताब के रिकॉर्ड
ज़रूरी दस्तावेज़
  1. कानूनी मांग नोटिस (भेजा गया और पावती मिली)
  2. सभी इनवॉइस और कॉन्ट्रैक्ट
  3. किए गए/मिले भुगतान दिखाने वाले बैंक स्टेटमेंट
  4. बाउंस हुआ चेक + रिटर्न मेमो (अगर लागू हो)
  5. बिज़नेस रजिस्ट्रेशन के दस्तावेज़
  6. कर्ज़दार का PAN/GST विवरण
  7. सेवा/डिलीवरी का सबूत
शिकायत कहां करें
  1. दीवानी अदालत — पैसे की वसूली का मुकदमा
  2. वाणिज्यिक अदालत — Rs. 3 लाख से ज़्यादा के विवादों के लिए
  3. NCLT — दिवाला कार्यवाही (Rs. 1 करोड़ या ज़्यादा का बकाया)
  4. लोक अदालत — मध्यस्थता से समझौता
  5. मजिस्ट्रेट कोर्ट — NI एक्ट धारा 138 (चेक बाउंस)
लागू कानून
  1. भारतीय संविदा अधिनियम — धारा 73 (अनुबंध तोड़ने पर मुआवज़ा)
  2. दीवानी प्रक्रिया संहिता — ऑर्डर 37 (वसूली के लिए संक्षिप्त मुकदमा)
  3. परक्राम्य लिखत अधिनियम — धारा 138 (चेक बाउंस)
  4. वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 — वाणिज्यिक विवादों का तेज़ निपटारा
  5. दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता — धारा 9 (परिचालन लेनदार का आवेदन)
  6. परिसीमा अधिनियम — धारा 3 (समय-सीमा: पैसे की वसूली के लिए 3 साल)
मामले को समझें

भारत में कारोबारी कर्ज़ वसूलने के लिए पहले कानूनी मांग नोटिस भेजा जाता है, फिर दीवानी अदालत में वसूली का मुकदमा दायर किया जाता है। अगर कर्ज़दार ने Rs. 1 करोड़ या ज़्यादा का भुगतान नहीं किया है, तो आप दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के तहत दिवाला कार्यवाही शुरू कर सकते हैं। चेक बाउंस के मामलों में NI एक्ट की धारा 138 मज़बूत आपराधिक उपाय देती है। वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम Rs. 3 लाख से ज़्यादा के वाणिज्यिक विवादों का तेज़ निपटारा करता है।

वकील से कब मिलें

मांग नोटिस भेजने से पहले वकील से सलाह लें, ताकि वह कानूनी रूप से सही हो। वसूली के मुकदमे और चेक बाउंस के केस दायर करने के लिए वकील ज़रूरी है।